शुक्रवार, 20 जून 2014

'परिलेख हिंदी साधक सम्मान' समारोह के अवसर पर प्रकाशित डॉ. जी. नीरजा का अंतरंग परिचय


नत नयन, प्रिय कर्मरत मन नीरजा 
-    डॉ. पूर्णिमा शर्मा

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
सहज समर्पण भाव और विनम्रता से हिंदी की मौन सेवा में लगी रहने वाली डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा भाषा और साहित्य से अपेक्षाविहीन प्रेम करती हैं. उन्हें आज तक किसी ने किसी तरह की शिकायत करते नहीं सुना. असुविधाएँ हैं, तो हुआ करें. वे बस अपने कर्म में किसी निष्काम कर्मयोगी की भाँति लगी रहती हैं. ‘नत नयन, प्रिय कर्मरत मन’ – तोड़ती पत्थर! कभी कोई धन्यवाद दे दे तो तरल मुस्कान से चेहरा खिल उठता है. लेकिन ज्यादातर धन्यवाद कोई देता नहीं – लोग काम निकलवाने में तो माहिर होते हैं लेकिन अपनी ओर से आगे बढ़कर सहयोग व सहायता देने वालों को धन्यवाद देना कतई जरूरी नहीं समझते. ऐसा नहीं है कि डॉ. नीरजा लोगों के इस ‘नाशुक्रे’ स्वभाव को नहीं जानतीं लेकिन इसे क्या कहिए कि तमाम तरह के ‘थैंकलेस’ काम करने के अपने स्वभाव को बदलना ही नहीं चाहतीं. तो ऐसी हैं हमारी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा. वे सदा हिंदी के नाम पर हर किसी का सहयोग करने को तत्पर रहती हैं और यही कारण है कि हैदराबाद के हिंदी जगत में – छात्रों, शोधार्थियों, अध्यापकों, पत्रकारों और साहित्यकारों के बीच – वे अच्छी खासी लोकप्रिय हैं. 


डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा का जन्म 11 मार्च 1975 को चेन्नै में हुआ. उनकी माताजी का नाम श्रीमती कुसुमा और पिताजी का नाम श्री गुर्रमकोंडा श्रीकांत है. माताजी सुशिक्षित गृहिणी हैं और पिताजी तेलुगु के सम्मानित पत्रकार एवं साहित्यकार. बचपन से ही नीरजा ने माँ से आत्मगोपन और पिता से गंभीरता का संस्कार पाया. उसी काल में उनके मन में कला, साहित्य, संगीत और नृत्य के प्रति प्रेम के बीज रोपे गए. आरंभिक शिक्षा-दीक्षा उन्होंने तमिल और अंग्रेजी माध्यम से प्राप्त की. घर में मातृभाषा तेलुगु का व्यवहार सीखा तथा तीन वर्ष की आयु से ही हिंदी की भी विधिवत शिक्षा प्राप्त की. मैट्रिक के बाद उन्होंने चिकित्सा संबंधी क्षेत्र में जाने का सपना देखा और विज्ञान विषयों की विधिवत पढ़ाई की. इसी बीच उन्हें अपने पिता और परिवार सहित चेन्नै से हैदराबाद आना पड़ा. दरअसल उनके पिता चेन्नै से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘सोवियत भूमि’ के तेलुगु संस्करण के संपादक थे जो सोवियत संघ के विघटन के बाद बंद हो गई. श्रीकांत जी सपरिवार हैदराबाद आ गए और कई वर्ष तक आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नेता-अभिनेता श्री एन.टी. रामाराव के पी.आर.ओ. के रूप में कार्यरत रहे. एन.टी.आर. के निधन के बाद तेलुगु समाचार पत्रों ‘उदयम’ और ‘वार्ता’ में काम किया. कुछ वर्ष वे ‘वार्ता’ समूह द्वारा संचालित पत्रकारिता विद्यालय के प्राचार्य भी रहे. परिवार के इस साहित्य और राजनीति मिश्रित परिवेश को आत्मसात करते हुए डॉ. जी. नीरजा ने 1995 में माइक्रोबायोलॉजी, जेनेटिक्स और केमिस्ट्री विषय लेकर उस्मानिया विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.एससी. उत्तीर्ण की. इसके बाद मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी में पीजी डिप्लोमा भी कर डाला. जैसा कि होना था, इस पाठ्यक्रम के बाद वे एक वर्ष अपोलो अस्पताल में माइक्रोबायोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत रहीं. अर्थात चिकित्सा संबंधी क्षेत्र में जाने का सपना पूरा हो गया. लेकिन पारिवारिक संस्कार शायद इस सपने से अधिक प्रबल था. भाषा और साहित्य का प्रेम बार-बार जोर मारता था. और एक दिन संस्कार ने सपने को जीत लिया. नीरजा ने वह नौकरी छोड़ दी और हिंदी क्षेत्र में छलांग लगा दी. 


2000 ई. में गुर्रमकोंडा नीरजा ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च शिक्षा और शोध संस्थान से प्रथम श्रेणी में एमए हिंदी की उपाधि अर्जित की तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया. सौभाग्यवश उन्हें प्रो. दिलीप सिंह जैसे भाषावैज्ञानिक और प्रो. ऋषभ देव शर्मा जैसे साहित्य मर्मज्ञ अध्यापकों का अहेतुक स्नेह मिला तथा इन दोनों गुरुजन की प्रेरणा से उन्होंने अनुवाद समीक्षा और अनुवाद तुलना जैसे अछूते क्षेत्र में शोधकार्य का निर्णय लिया. 2001 में उन्होंने ‘कुरुक्षेत्र : अंग्रेजी अनुवाद की समीक्षा’ पर एमफिल की शोधोपाधि प्राप्त की तथा एक और स्वर्ण पदक अर्जित किया. आगे उन्होंने ‘श्रवणकुमार कृत उपन्यास ‘प्रेत’ : अंग्रेजी अनुवाद का संदर्भ’ विषय पर शोधप्रबंध प्रस्तुत करके 2006 में पीएचडी उपाधि प्राप्त की. अपने इन शोधकार्यों के आधार पर डॉ. जी. नीरजा को बहुभाषाविद अनुवाद समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई. इस अवधि में उन्होंने स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा और पत्रकारिता डिप्लोमा की परीक्षाएँ भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर डालीं.


एमए के बाद से ही गुर्रमकोंडा नीरजा ने कई विद्यालयों में हिंदी अध्यापन का कार्य आरंभ कर दिया था. पीएचडी के बाद 2007 में उन्हें उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद परिसर में प्राध्यापक के रूप में विधिवत नियुक्ति प्राप्त हो गई. और यहाँ से शुरू हुआ भाषा और साहित्य की सेवा का उनके जीवन का नया अध्याय. उन्होंने अपनी निष्ठा और श्रमशीलता के आधार पर अल्प अवधि में ही छात्रों के मन में अपनी जगह बना ली. उन्हें स्नातकोत्तर कक्षाओं में सामान्य भाषाविज्ञान, अनुवाद विज्ञान, व्यतिरेकी विश्लेषण, अन्य भाषा शिक्षण, प्रयोजनमूलक हिंदी और समाजभाषाविज्ञान जैसे विषयों की विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है. 


शोध निर्देशक के रूप में भी डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की उपलब्धियाँ प्रशंसनीय रही हैं. उनके निर्देशन में संपन्न शोधकार्यों की सूची के अवलोकन से यह पता चलता है कि उनका ज्ञान क्षेत्र कितना व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण है. उनके द्वारा निर्देशित तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद समीक्षा संबंधी शोधकार्यों में तेलुगु-हिंदी कविताओं में विद्रोही चेतना, विश्वनाथ सत्यनारायण कृत ‘वेयिपडगलु’ का हिंदी अनुवाद ‘सहस्रफण’ : अनुवाद समीक्षा, एन. गोपि कृत तेलुगु काव्य ‘कालान्नि निद्रपोनिव्वनु’ का हिंदी अनुवाद : तुलनात्मक अध्ययन, माधवीकुट्टी कृत मलयालम उपन्यास ‘वंडीकालकल’ का हिंदी अनुवाद, मुदिकोंडा शिवप्रसाद के तेलुगु उपन्यास ‘रेज़िडेंसी’ का हिंदी अनुवाद : अनुवाद समीक्षा एवं अनुवाद मूल्यांकन जैसे शोधकार्य सम्मिलित हैं. इसी प्रकार भाषा संबंधी शोधकार्य के रूप में वाणिज्यिक हिंदी : समस्याएँ और संभावनाएँ (बैंकिंग हिंदी के विशेष संदर्भ में) का उल्लेख किया जा सकता है. मीडिया विमर्श जैसे नए क्षेत्र में शोध कराना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है. डॉ नीरजा ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अलका सरावगी के उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ में मीडिया विमर्श, हिंदी ब्लॉगिंग में महिला ब्लॉगरों का योगदान विषयों पर भी शोधकार्य कराए हैं. स्त्री विमर्श डॉ. नीरजा का विशेष रुचि क्षेत्र है जिसका प्रमाण उनके द्वारा निर्देशित महुआ माजी के उपन्यास ‘मैं बोरिशाइल्ला’ में स्त्री विमर्श, चंद्रकांता कृत ‘हाशिए की इबारतें’ में स्त्री विमर्श, नीलम कुलश्रेष्ठ के कहानी संग्रह ‘हैवेनली हेल’ में स्त्री विमर्श, सिम्मी हर्षिता के उपन्यास ‘जलतरंग’ में स्त्री विमर्श, विष्णु प्रभाकर के उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ में स्त्री विमर्श, मनोज सिंह के उपन्यास ‘कशमकश’ में स्त्री विमर्श जैसे शोधप्रबंध बाकायदा देते हैं. इसी प्रकार दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक विमर्श का क्षेत्र भी उन्होंने अछूता नहीं छोड़ा है. इस संदर्भ में उनके द्वारा निर्देशित के.एस. तूफ़ान का दलित विमर्श : ‘टूटते संवाद’ का विशेष संदर्भ, मधुकर सिंह के उपन्यास ‘बाजत अनहद ढोल’ में आदिवासी विमर्श, नई शती के कथा साहित्य में अल्पसंख्यक विमर्श (मुस्लिम समाज के विशेष संदर्भ में) शीर्षक शोधकार्यों का अवलोकन किया जा सकता है. उनके द्वारा निर्देशित अन्य शोधप्रबंधों में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन, पुनर्जागरण के संदर्भ में बालकृष्ण भट्ट कृत ‘निबंधों की दुनिया’ का अनुशीलन, अनंत काबरा के कविता संग्रह ‘पड़ाव पर ठहरे कदम’ में सामाजिक यथार्थ, विश्वनाथ अय्यर के ललित निबंधों में दक्षिण भारत की झलक, रामदरश मिश्र के उपन्यास ‘जल टूटता हुआ’ में आंचलिकता, हरिशंकर परसाई के निबंधों में व्यक्तित्व और वैचारिकता (‘निबंधों की दुनिया’ का विशेष संदर्भ), कमलेश्वर के कहानी संग्रह ‘देस-परदेस’ में चित्रित सामाजिक समस्याएँ, उषा प्रियंवदा के कहानी संग्रह ‘एक कोई दूसरा नहीं’ में वस्तु और शिल्प, क्षमा शर्मा के कहानी संग्रह ‘रास्ता छोड़ो डार्लिंग’ में मध्यवर्ग, श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दराबारी’ में राजनैतिक चेतना, अमरकांत के उपन्यास ‘सूखा पत्ता’ में आधुनिकताबोध, राजेंद्र अवस्थी की कहानियों में आधुनिकताबोध, रामदरश मिश्र की कहानियों में ग्राम चेतना शामिल हैं. 

'परिलेख हिंदी साधक सम्मान' समारोह (12/6/2014) के अवसर पर प्रकाशित  परिचय पुस्तिका का आवरण 


नीरजा को कविताएँ लिखने का शौक छात्र जीवन से रहा. यदाकदा छपती भी रहीं. लकिन जब 2008 में उन्हें दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की द्विभाषी (हिंदी-तेलुगु) साहित्यिक मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के संपादन का दायित्व मिला, तब से उनके लेखन में नियमितता आई. यही समय था जब उन्होंने गंभीरता से तेलुगु के पुराने-नए साहित्य का अध्ययन आरंभ किया और सहज सरल भाषा शैली में तेलुगु साहित्य तथा साहित्यकारों के संबंध में लिखना आरंभ किया. उनके तेलुगु भाषा-साहित्य विषयक लेखन को ‘स्रवंति’ के साथ साथ उनके ब्लॉग ‘सागरिका’ के माध्यम से पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हुई. उनके ऐसे लेखों का एक संग्रह ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ शीर्षक से 2012 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ जिसे सुधी पाठकों और विद्वानों का भरपूर स्नेह मिला. शीर्षस्थ तेलुगु कवि प्रो. एन.गोपि ने इस कृति की प्रशंसा करते हुए लिखा कि “तेलुगु भारत में हिंदी के बाद सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. अतः तेलुगु में निहित साहित्यिक धरोहर से हिंदी जगत को परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है. डॉ. नीरजा केवल विदुषी भर नहीं अपितु समय समय पर अपने आप को अद्यतन रखने वाली आलोचक भी हैं. इसलिए वे स्वाभाविक रूप से इतिहास बोध से भी संपन्न हैं. खास तौर पर समकालीन तेलुगु साहित्य को वे जिस दृष्टि से देख रही हैं, वह निरंतर परिवर्तित होते साहित्य के अनुशीलन का परिचायक है.” इसी प्रकार प्रमुख हिंदी भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह ने भूमिका में कहा कि “गुर्रमकोंडा नीरजा ने तेलुगु साहित्य का परिचयात्मक आकलन अपनी इस पुस्तक में दिया है. लेखिका ने जटिलता भरे विस्तार की जगह उन मुद्दों को उभारने की कोशिश की है जिनसे तेलुगु साहित्य की सामाजिकता अथवा लौकिकता का उद्घाटन हो सके और इसके जरिए तेलुगु साहित्य में मनुष्य और मनुष्यता का जो भाव प्रारंभ से ही अंतर्भुक्त है, उभार पा सके. जी.नीरजा की यह पैनी दृष्टि ही पुस्तक की प्राण-रेखा है.” इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लिखा है कि “पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य : एक अवलोकन’ में लेखिका डॉ. जी.नीरजा ने तेलुगु के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों का साहित्यिक परिचय देते हुए जहाँ एक ओर इस बात का खयाल रखा है कि सूचना और विवेचन दोनों का मणिकांचन संयोग हो सके, वहीं यह भी ध्यान रखा है कि इन निबंधों के माध्यम से हिंदीभाषी समाज आंध्र प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को भी हृदयंगम कर सके. विषयवस्तु की दृष्टि से यह निबंध संग्रह तेलुगु साहित्य के विविध कालों, विविध विधा प्रकारों, विविध प्रवृत्तियों और विविध साहित्यकारों को समेटे हुए है.” इतना ही नहीं, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. देवराज ने नीरजा की इस पुस्तक की विस्तृत समीक्षा करते हुए ‘संकल्य’ मासिक में लिखा है कि “गुर्रमकोंडा नीरजा की इस पुस्तक में अन्नमाचार्य, कृष्णदेव राय, त्यागराज, वीरेशलिंगम पंतुलु, कशीनाथुनि नागेश्वराराव पंतुलु, गुरजाडा वेंकट अप्पाराव, उन्नव लक्ष्मीनारायण, जनकवि श्री श्री, दिगंबर कवि ज्वालामुखी, त्रिपुरनेनि गोपीचंद, आरुद्रा, डी. कामेश्वरी आदि के साहित्यिक अवदान के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराई गई है. स्मरणीय है कि भारतीय नवजागरण का सांस्कृतिक और साहित्यिक परिदृश्य वीरेशलिंगम पंतुलु और गुरजाडा अप्पाराव जैसे कालजयी रचनाकारों के कृतित्व को जाने बिना नहीं समझा जा सकता. नीरजा की पुस्तक से पता चलता है कि वीरेशलिंगम पंतुलु आंध्र साहित्य के भारतेंदु हैं. उन्हें गद्य ब्रह्म और गद्य तिक्कना भी कहा जाता है. उन्होंने आंध्र में जाति-विरोध आंदोलन का सूत्रपात किया था. वे लिखती हैं, “तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर वीरेशलिंगम ने जनता को चिर निद्रा से जगाया, चेताया, स्त्री सशक्तीकरण को प्रोत्साहित किया, स्त्री शिक्षा पर बल दिया, बालविवाह का खंडन किया, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और ज़मींदारी प्रथा का विरोध किया. उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर दिखाई नहीं देता. उन्होंने 11 दिसंबर, 1881 को प्रथम विधवा पुनर्विवाह संपन्न करवाया जिसके कारण उनकी कीर्ति देश-विदेश में फ़ैल गई. वीरेशलिंगम पंतुलु ने अपने एक-सौ तीस ग्रंथों से तेलुगु साहित्य को समृद्ध किया, जिनमें राजशेखर चरित्रमु जैसा मौलिक उपन्यास तथा कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम का तेलुगु रूपांतर शामिल है.” प्रो. देवराज ने आगे लिखा है कि “वर्तमान में भारतीय भाषाओं के साहित्य और भारतीय साहित्य पर नए सिरे से विमर्श की शुरूआत हुई है. इस परिघटना में हिंदी समालोचना से सबसे अधिक सक्रियता की अपेक्षा है. जो समीक्षक हिंदी में हिंदी के इतर भाषाओं और उनके साहित्य पर केंद्रित कार्य करने में समर्थ हैं वे भारतीय साहित्य की परिकल्पना को यथार्थ बनाने में वास्तविक रचना-घटक की भूमिका निभा सकते हैं. इस अभियान में इतनी सावधानी भी ज़रूरी है कि उनके द्वारा प्रतुत सामग्री विश्लेषणपरक और प्रामाणिक हो. उसमें अंतिम निष्कर्ष देने की जल्दबाजी न हो. गुर्रमकोंडा नीरजा भारतीय साहित्य के इस अभियान से जुड़ने को संकल्पबद्ध हुई हैं, उन्हें मेरी शुभकामनाएँ; और उनसे यह अपेक्षा भी कि वे अपने अध्ययन में और अधिक गंभीरता, और अधिक गहराई लाने की कोशिश करेंगी.” 


नीरजा अध्यापक, संपादक, समीक्षक और कवयित्री तो हैं ही, बहुभाषाविद होने के नाते अच्छी अनुवादक भी हैं. उन्होंने हिंदी से तमिल और तेलुगु में तथा अंग्रेजी से हिंदी व हिंदी से अंग्रेजी में काफी साहित्यिक और साहित्येतर पाठों का अनुवाद किया है. तेलुगु के नागार्जुन माने जाने वाले प्रजाकवि पद्मविभूषण डॉ. कालोजी नारायणराव की जन्मशताब्दी पर विशेष रूप से प्रकाशित 100 कविताओं के हिंदी अनुवाद कार्य से वे अनुवादक मंडल के एक सदस्य के रूप में तो संबद्ध रहीं ही, अनुवाद-संपादन का कार्य भी अत्यंत मनोयोग और सफलता से निभाया जिसकी तेलुगु और हिंदी दोनों ही के साहित्यिक हलकों में भूरि भूरि प्रशंसा हुई है. 

परिचयकर्ता  डॉ. पूर्णिमा शर्मा और सम्मानित  डॉ. जी. नीरजा 

हिंदी भाषा और साहित्य की निष्काम सेवा में रत डॉ. नीरजा के काम पर विभिन्न साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थाओं का ध्यान जाना स्वाभाविक है. यही कारण है कि उन्हें कई सम्मानों-पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है जिनमें आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी का ‘युवा लेखक पुरस्कार (2012)’ तथा तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी का ‘साहित्य सेवी सम्मान (2014)’ उल्लेखनीय हैं. इतना ही नहीं, 2012 में जब हैदराबाद से भाषा, संस्कृति और विचारों की अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘भास्वर भारत’ आरंभ हुई तो उसके संपादक-प्रकाशक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने डॉ. नीरजा को मानद साहयक संपादक के रूप में उसमें शामिल करना आवश्यक समझा. 


कुलमिलाकर यह कहना उचित होगा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा हिंदी और तेलुगु के बीच साहित्यिक सेतुबंध के महान अनुष्ठान में अपना शक्तिभर योगदान करने में सदा निरभिमान हिंदी सेवी की तरह तत्पर रहती है.उनको ''परिलेख हिंदी साधक सम्मान -2014'' से सम्मानित किया जाना उचित ही है. मैं उनके उज्ज्वल भविष्य और समृद्ध जीवन के लिए शुभकामना करती हूँ. 


-   डॉ. पूर्णिमा शर्मा, 
208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013, मो. 08125336300


गुरुवार, 30 जनवरी 2014

जन्मदिन 2014


मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

यह समय

कथा अधूरी है!
भाषा गूंगी !!

यह व्यंग्य का समय है!!!

                              -पूर्णिमा शर्मा 

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

रोचक शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ : 'फूलों से प्यार'

-डॉ. पूर्णिमा शर्मा

साहित्य मनोरंजन, रसास्वादन और चेतना को उद्बुद्ध करने जैसे कई काम करता है. लेकिन उसका सबसे चुनौतीपूर्ण काम शिक्षा प्रदान करने और चरित्र निर्माण करने का होता है. यह काम चुनौतीपूर्ण इसलिए है कि इसकी सिद्धि के लिए साहित्य को उपदेश का सहारा नहीं लेना है. आचार संहिताओं और नैतिक उपदेशों के स्थान पर साहित्य को कांतासम्मित उपदेश का मार्ग अपनाना होता है. विशेष रूप से बाल साहित्य इसी तकनीक को अपना कर अपनी रोचकता और सार्थकता बरकरार रख सकता है. 'फूलों से प्यार' में प्रतिष्ठित लेखिका, पवित्रा अग्रवाल ने इसी मार्ग को अपना कर रोचक घटनाओं और प्रेरक चरित्रों के माध्यम से नैतिक मूल्यों का सन्देश देने में सफलता पाई है.

यह संग्रह बच्चों के लिए लिखी गयी छोटी छोटी २५ कहानियों का संग्रह है. यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि इन कहानियों में परियों, भूतों, जादूगरों, चुड़ैलों और चमत्कारों का कोई स्थान नहीं है. पवित्रा जी मानती हैं कि इन तमाम तरह के कथानकों वाली कहानियां बच्चों को यथार्थ से काटकर जीवन से दूर कर देती हैं, इसीलिए उन्होंने अपने आस-पास के वास्तविक जीवन को अपनी बाल कथाओं का आधार बनाया है. ये कहानियां इस धारणा को खंडित करती हैं कि बच्चों के लिए काल्पनिक जगत की कहानियाँ चाहिए. ये कहना बिलकुल ठीक होगा कि ठोस ज़मीनी सच्चाइयों से जुडी पवित्रा अग्रवाल की कहानियां बच्चों में तर्क शक्ति और वैज्ञानिक चेतना को स्थापित करने में समर्थ हैं. 

इन कहानियों में बच्चों का मनोविज्ञान अत्यंत सहज रूप में उभर कर सामने आया है. बच्चों की जिज्ञासा वृत्ति, अनुकरण के साथ साथ कुछ मौलिक करने की प्रवृत्ति, प्रश्न करने का स्वभाव और सच तक पहुँचने की बेचैनी इन कहानियों को विकसित करती हैं और इसी दौरान लेखिका बड़ी चतुराई से किसी होशियार माँ की तरह नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ा देती है जिसका परम उद्देश्य चरित्र निर्माण है. 

साहित्य चाहे बच्चों के लिए लिखा जाए या बड़ों के लिए, उसकी चरम सार्थकता अमंगल का नाश करने में है. अंधविश्वास, कुरीतियाँ, गलत प्रथाएं, सड़े गले और मानव विरोधी रिवाज़ तथा अवैज्ञानिक मान्यताएं कुछ ऐसे कारक हैं जो मनुष्य, मनुष्यता और समाज के लिए अमंगलकारी हैं. सत्साहित्य इन पर चोट करता है. वह किसी भी प्रकार के पाखण्ड का विरोधी होता है - चाहे वह धार्मिक गुरुओं का पाखण्ड हो या समाज के नेताओं का. बहुत साधारण सी दिखने वाली घटनाओं के सहारे पवित्रा अग्रवाल ने 'फूलों से प्यार' में इन तमाम अमंगलकारी तत्वों पर तार्किकता की चोट की है. दीपावली पर जूआ खेलने की छूट को उन्होंने 'सच्चा दोस्त' में निशाना बनाया है, तो तम्बाकू पीने की लत पर 'जन्मदिन का उपहार' में वार किया है. 'खाने के रंग' में गलत आदतों पर प्रहार किया गया है, तो अन्यत्र हड़ताल की प्रवृत्ति पर चोट की गयी है. यह सारा अमंगलनाश का कार्य लेखिका किसी कुशल कुम्हार की तरह सहार सहार कर चोट देते हुए करती हैं. इसके बाद वे, बाल पाठक के चित्त को एक खूबसूरत पात्र का आकार देते हुए उस पर मूल्यों की रंगकारी करती हैं. इन मूल्यों में सत्य, ईमानदारी, पर्यावरण संरक्षण, कौटुम्बिक स्नेह, रिश्ते नातों की मर्यादा, कर्त्तव्य निष्ठा, निर्भीकता और मानव प्रेम जैसे सन्देश निहित हैं. 

साफ़ सुथरे और तर्क पर आधारित बाल साहित्य के अकाल के ज़माने में 'फूलों से प्यार' की बालकथाएँ महकती बयार का सुख देती हैं. इन कहानियों को प्राइमरी स्तर के सब बच्चों तक पहुंचना चाहिए.

समीक्षित पुस्तक : 'फूलों से प्यार'(बाल कहानियां).
लेखिका : पवित्रा अग्रवाल.
प्रथम संस्करण : २०१२.
प्रकाशक : अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली.
मूल्य : १५० रुपये(सजिल्द).
पृष्ठ : ८०. 

सोमवार, 16 सितंबर 2013

एकप्राण



मौलवी ने उठाई सन्टी
और दे मारी मजनू की पीठ पर
लैला चीख कर बेहोश हो गई
लाल – नीले निशान उभर आए
अंग अंग पर

प्यार इसी को कहते हैं

-पूर्णिमा शर्मा 

बेटी की विदाई

तीस साल पहले
मेरी माँ ने
कहा था मेरे कान में-
बेटी, आज तक तुम पराया धन थी 
आज हम पराये हुए,
और समझाया था पिता ने 
लड़कियों का कोई अतीत नहीं होता 

पीहर की दहलीज लांघते ही 
जला दिया था मैंने 
अपने कल को, 
आज भी 
जल रही है उन सपनों की चिता 
पिता के आँगन में 

तीस बरस से 
मैं सींचती रही हूँ 
पीपल का एक पेड़,
हर शनिवार को कच्चे धागे लपेटकर 
करती रही हूँ परिक्रमा 
और उगाती रही हूँ 
रिश्तों की लहलहाती लताएं 

मेरे भीतर 
एक माँ रहती है 
और एक बेटी भी. 
बेटी को जाना है दहलीज के पार; 
और माँ कहना नहीं चाहती -  
आज तक तुम पराया धन थी 
आज हम पराये हुए 
लड़कियों का कोई अतीत नहीं होता
जलाना होगा तुम्हे अपना कल

नहीं! 
मैं खड़ी हूँ 
अपनी बेटी के साथ; 
मैं उसका कल हूँ; 
और मैं खुद को जलाने की इजाज़त नहीं दूँगी !!

- पूर्णिमा शर्मा 

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

"भारतीय साहित्य की प्रवृत्तियाँ" : प्रश्न डॉ. ऋषभ के, उत्तर डॉ. देवराज के.

1 अप्रैल 2013, हैदराबाद.
प्रो. देवराज (अधिष्ठाता, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) और प्रो. ऋषभ देव शर्मा (हैदराबाद) की फोन वार्ता : प्रश्न डॉ. ऋषभ के, उत्तर डॉ. देवराज के. 
विषय : "भारतीय साहित्य की प्रवृत्तियाँ"

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

कुंभ मेला : विशिष्टता और भारतीय संस्कृति


मकर संक्रांति अर्थात 14 जनवरी 2013 से माघी पूर्णिमा अर्थात 25 फरवरी 2013 के बीच प्रयाग-इलाहाबाद में दुनिया का सबसे बड़ा मेला - कुंभ - आयोजित हो रहा है. समझा जाता है कि इस अवधि में तीर्थराज प्रयाग को लगभग दस करोड़ श्रद्धालुओं का आतिथ्य करना होगा. कहते हैं कि मेले की तैयारी और शहर के सुंदरीकरण आदि पर हजार-बारह सौ करोड़ खर्च किए गए हैं. खुशी की बात यह है कि इस बहाने बहुत सारे रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं. व्यवसाय और पर्यटन उद्योग के विकास की दृष्टि से भी कुंभ पर्व का यह मेला बहुत अधिक महत्वपूर्ण है. कहने का मतलब यह है कि कुंभ मेला केवल धार्मिक ही नहीं, देशवासियों को सामाजिक और आर्थिक लाभ भी प्रदान कर रहा है. 

यह तो आपको मालूम ही है कि कुंभ मेला भारत में अलग-अलग अवसरों पर चार पवित्र स्थलों प्रयाग, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में लगता है. असल में, भारतीय संस्कृति का यह सबसे बड़ा पर्व नदी-उत्सव के रूप में सब प्रकार के भेदभावों से परे समस्त जन का पर्व है. याद रहे कि कुंभ पर्व में कोई जातिभेद या वर्णभेद नहीं चलता, बल्कि इसके लिए विशेष रूप से यह व्यवस्था है कि इसे सभी को मिलकर मनाना चाहिए. 

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह पर्व मूलतः ज्ञान का पर्व है. कहना न होगा कि कुंभ पर्व नदी तट पर ऋषि–मुनियों से लेकर आम आदमी तक के धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतन-मनन और विचार विमर्श की परंपरा का ही बदला हुआ रूप है. अपने मूल रूप में यह मेला व्यापक जन समागम और खुली लोकतांत्रिक चर्चा का मंच हुआ करता था. लोगों को जोड़ने वाले इस अद्भुत पर्व के लिए जिन चार स्थानों को चुना गया वहाँ प्रत्येक बारह साल में कुंभ का आयोजन होता है. अभिप्राय यह है कि कुंभ मेला हर तीन वर्ष में एक बार इन चार अलग-अलग स्थानों पर लगता है. अर्द्धकुंभ मेला हर छह वर्ष में हरिद्वार और प्रयाग में लगता है. जबकि बारह वर्ष बाद लगने वाले मेले को पूर्णकुंभ कहा जाता है. बारह पूर्णकुंभ मेलों के बाद केवल प्रयाग में हर 144 वर्ष बाद महाकुंभ मेला लगता है. पिछली बार 2001 में प्रयाग (इलाहाबाद) में महाकुंभ आयोजित हुआ था जो अगली शताब्दी में 2145 में ही पुनः आयोजित होगा. इस बीच 2003, 2004 और 2010 में क्रमशः नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में कुंभ का आयोजन हो चुका है जबकि अर्द्धकुंभ 2004 में हरिद्वार और 2007 में इलाहाबाद में आयोजित हुआ है. 2001 के महाकुंभ के बारह वर्ष बाद पड़ने के कारण 2013 का प्रयाग का कुंभ पूर्णकुंभ होगा. यह सारी गणना ग्रह-नक्षत्रों के विशिष्ट राशियों में आने, जाने, ठहरने के अनुसार की जाती है. 

कुंभ मेलों की परंपरा कितनी प्राचीन है, कहना मुश्किल है. माना यह जाता है कि किसी पुराकाल में देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्न निकाले थे जिनमें सबसे अंत में अमृत कुंभ निकला था. देवगण भय और लोभ वश असुरों को अमृत से वंचित रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने अमृत कुंभ चुरा लिया. बस फिर क्या था; युद्ध छिड़ गया. बारह दिन-रात देव और असुर लड़ते रहे. आखिर विष्णु को मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत और असुरों को वारुणी पिलानी पड़ी. देवलोक के ये बारह दिन-रात पृथ्वी लोक के बारह बरस थे. अर्थात बारह बरस तक अमृत कुंभ को लेकर छीना-झपटी चलती रही. सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और शनि ने जी-जान से अमृत कुंभ की रक्षा की. चंद्र ने उसे छलकने से, गुरु ने चोरी होने से, शनि ने इंद्र के भय से और सूर्य ने फूटने से बचाया. फिर भी कुछ बूँदें छलक ही गईं. अमृत जहाँ जहाँ छलक कर गिरा वहाँ वहाँ ही कुंभ पर्व आयोजित होने लगे. जिन देवों ने कुंभ की रक्षा की थी उनका विशिष्ट राशियों में संचार कुंभ की तिथियों का आधार बना. जैसे गुरु के वृष राशि में और सूर्य के मकर राशि में संचार के समय प्रयाग में कुंभ मेला लगता है. 

यह तो हुई पौराणिक मान्यता. लेकिन देखा यह भी गया है कि हर 12-13 वर्ष के अंतराल पर सूर्य पर कुछ परिवर्तन घटित होते है. विस्फोट बढ़ जाते हैं. अतः कुंभ पर्व का इस ब्रह्मांडीय गतिविधि के साथ कुछ-न-कुछ संबंध अवश्य प्रतीत होता है जिसकी पुष्टि संभवतः आने वाले समय में हो सके. 

दरअसल नदी स्नान और नदी मेलों की परंपरा का विकास भारतीय संस्कृति के विकास के साथ साथ ही हुआ है. इतिहासकार एस.बी.राय ने दस हजार ई.पू. तक अनुष्ठानिक नदी स्नान के प्रमाण खोज निकाले हैं और यह भी माना है कि कुंभ मेलों के वर्तमान स्वरूप की नींव 300 ई.पू. में रखी गई. हालांकि इससे पहले 600 ई.पू. में बौद्ध लेखों में नदी मेलों का उल्लेख मिलता है. आगे चलकर सम्राट हर्षवर्धन के समय चीनी यात्री ह्वेन सांग के साक्ष्य से 600 ई. में प्रयाग के कुंभ का प्रमाण मिलता है. 10 वीं शताब्दी से विभिन्न अखाड़ों का गठन शुरू हुआ – निरंजनी, जूना, कनफटा योगी आदि. वर्तमान में अखाड़ों का विशिष्ट शिष्टाचार कुंभ मेलों का एक रोचक पहलू रहता है. 

अगर इतिहास को खंगाल कर देखें तो पाता चलता है कि कुंभ मेलों ने कई तरह की हिंसा भी देखी है. 1690 में में नासिक मेले में और 1760 में हरिद्वार मेले में हजारों लोग मारे गए. इस अराजकता से पार पाने के लिए 1780 में ब्रिटिशों ने मठवासी समूहों और अखाड़ों के शाही स्नान की व्यवस्था की जो अब भी चली आ रही है. 

भगदड़ और दुर्घटनाओं का भी अपना इतिहास है. उदाहरण के लिए 1820 में हरिद्वार में और 1954 में प्रयाग में भगदड़ मची और सैकड़ों लोग मारे गए. 2003 में नासिक के कुंभ में भी अनेक भक्त मारे गए. हुआ यह था कि पवित्र स्नान के समय तीस हजार की भीड़ के बीच एक साधु ने चाँदी के सिक्के उछाल दिए और भगदड़ मच गई. कहने का मतलब यह है कि दुनिया के सबसे बड़े भीड़-भाड़ वाले इस मेले की व्यवस्था न तो पहले आसान थी और न आज. 

आपसी संघर्ष और दुर्घटना के अलावा एक भीषण नरसंहार की स्मृति भी कुंभ मेले से जुडी है. तुगलक सुल्तानों के राज्यकाल में खुरासान के अमीर ज़फर तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया और उनकी धार्मिक सहिष्णुता का दंड देने के लिए उसने 1398 में दिल्ली को ध्वस्त करने के बाद हरिद्वार पहुँचकर कुंभ मेले में मार-काट मचाई थी. वह स्नानपूर्व वैशाखी पर हरिद्वार आया था और कुंभ मेले में नरसंहार के साथ साथ उसने तत्कालीन नगर मायापुर को भी तबाह कर दिया था. 

लेकिन दुर्घटनाएँ हों, आपसी संघर्ष हों, नरसंहार हो, तबाही मचे – पर मेला थमता नहीं है. और वह भी कुंभ मेला. जनता का सैलाब दिशा दिशा से आकर संगम पर मिलता है. प्रयाग स्वयं संगम का पर्याय है. तीर्थराज प्रयाग गंगा-यमुना के साथ ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री सरस्वती के संगम का पुण्य स्थल है. दिशा दिशा से आते हुए आबालवृद्ध नर-नारी, मोक्ष के चाहने वाले श्रद्धालु जन, ज्ञान-विज्ञान और ज्योतिष के पंडित और महापंडित, दिव्य साधनाओं में जुटे हुए पूज्य महात्मा और संतजन और धर्म की दूकान चलाने वाले पाखंडियों सहित व्यापक जन समागम तीर्थराज प्रयाग को संगम और कुंभ दोनों ही अर्थों में चरितार्थ करता है. 

यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कुंभ मेला हमारी भारतीय संस्कृति की मूलभूत एकता का दर्शन कराने वाला मेला है. इसमें संदेह नहीं कि कुंभ मेले का एक बड़ा लक्ष्य एकता का दर्शन है. जैसा कि पंडित विद्या निवास मिश्र ने कहा है, यह एकता कोई ठोस, जड़ या सिद्ध पदार्थ नहीं, यह एकता भी एक तरल प्रक्रिया है. बर्फ और जल एक है. यह पहचान बर्फ के पिघलने पर ही तो होती है. विभिन्न साधनाओं से गुजरे हुए संत जब एक दूसरे के प्रति विनम्र होकर द्रवीभूत होकर एक दूसरे को अनुभव निवेदन करते हैं तो एकता की प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रक्रिया हो जाती है. वे यह भी कहते हैं कि कुंभ के अवसर पर इतने असंख्य संतों के बीच में रहने का एक अर्थ है यह अनुभव कि निजता खोकर ही जीवन के विशाल प्रवाह के साथ एक हुआ जाता है. इस बहाने आम जन भी विभिन्न संप्रदायों की उपासना पद्धतियों में निहित एक ही महाभाव और परस्पर पूरकता को देख पाते हैं. 

अमरत्व प्राप्त करने की आकांक्षा मनुष्य की चरम आकांक्षा है. पूर्णकुंभ पर्व उसकी साधना का जनपथ है. सबके साथ मिलकर ही, व्यक्तिबोध को खोकर ही, पूर्णता का बोध संभव हो सकता है. इसके आगे अमरता और क्या हो सकती है! कुंभ ज्ञान और भक्ति के विविध प्रवाहों के एक साथ आ मिलने से घटित होने वाले उस रूपांतरण की भूमिका है जहाँ कुंभ और जल का भेद मिट जाता है. अहं पराहम् में विलीन हो जाता है; और लघु विराट में. इसीलिए यह कहा गया है कि कुंभ-स्नान से मोक्ष प्राप्त होता है. वास्तव में यह कोई पारलौकिक नहीं बल्कि लौकिक घटना है कि यदि अपने अहंकार से मुक्त होकर व्यक्ति खुद को व्यापक जन-प्रवाह के साथ वैसे जोड़ दे जैसे बूँद जल-प्रवाह से जुडी होती है तो यही मोक्ष है. 

इसमें दो राय नहीं कि आज के जमाने में कुंभ मेला अपने सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ को छोड़कर व्यापक अर्थ में बाजार और मीडिया की रुचि का जमावड़ा हो गया है. निरहंकार संत समागम के स्थान पर धर्म के अखाड़ों की वर्चस्व और अहंकार की प्रदर्शनी बन गया है. गुरुओं की दूकानें लगी हैं और मुक्ति बिक रही है. सीधी-सादी ग्रामीण जनता ही नहीं राजनीति, शिक्षा, व्यापार और कला जगत के जाने कितने धुरंधर अंधविश्वास, पाखंड और प्रचार की त्रिवेणी में स्नान करके जन प्रवाह को गंदला कर रहे हैं. आवश्यकता है कुंभ पर्व की मूल भावना को समझने की. आवश्यकता है बदली हुई परिस्थितियों में मनुष्य, समाज और प्रकृति के संबंधों की नई व्याख्या करने की. आवश्यकता है धर्म और विज्ञान के सहयोग की नई दिशाएँ खोजने की. Ο 

[प्रसार भारती, हैदराबाद केंद्र से  22.1.2013 को महिला-संसार के अंतर्गत प्रसारित वार्ता]

रविवार, 16 दिसंबर 2012

प्रजा का हालचाल


और हर रात की तरह
उस रात भी
बादशाह की रूह सफ़ेद चादर ओढकर निकली  
अपनी प्रजा का हालचाल जानने को.

तीसरे पहर तक
सब ठीक ठाक था
पर चौथा पहर शुरू होते – न होते
घुप्प अन्धेरे को चीरती
किसी के रोने की आवाज़
बेचैन करने लगी बादशाह की रूह को.
उड़ने लगी रूह सिसकियों के तार से बँधी सी.

पहचानते देर न लगी
ये सिसकियाँ थीं भागमती की
और निकल रही थीं चारमीनार के दिल से.

बादशाह की रूह काँप उठी
सौभाग्य का जो नगर बसाया था
घर की लक्ष्मी को भाग्य की लक्ष्मी बनाया था,
उसकी दहलीज सियासत का अखाडा बन गई
और छत विद्वेष से तन गई

जानकार लोग कहते हैं
उस रात से
मीनार और मंदिर हर रात सिसकियाँ भरते हैं
और बादशाह की रूह
काँप काँप जाती है
काँप काँप जाती है.

-          पूर्णिमा शर्मा